Wednesday, September 5, 2012

सूर्य- ज्योतिष -हम


सूर्य

खगोल -शास्त्र के अनुसार सूर्य हीलियम और हाइड्रोजन से निर्मित एक अग्निपिण्ड हैं , जो आकाश में स्थित अनंत आकाश गंगाओं में Spiral या मन्दाकिनी नामक एक आकाश गंगा के परिवार में स्थित 1 ½ खरब तारों में एक छोटा सा तारा मात्र हैं. सूर्य का डायमीटर 6 लाख मील हैं जो पृथ्वी से 110 गुना बड़ा हैं. सोलर फॅमिली में 9 ग्रह, ग्रहों के उपग्रह , अनगिनत asteriods , meteors , comets इत्यादि आते हैं.


सोलर -सिस्टम के समस्त घटक सूर्य के प्रबल आकर्षण शक्ति से जकड़े हुए उसकी परिक्रमा करते हैं. अपने इस पूरे परिवार को लेकर सूर्य खुद 200 किलोमीटर/सेकंड की रफ्तार से Spiral आकाश गंगा की परिक्रमा करता हैं . इस एक परिक्रमा में उसे 25 करोड़ वर्ष लगते हैं. सूर्य का तापमान लगभग 6,000-से- 60,000 सेन्टीग्रेड हैं.


सूर्य-पृथ्वी



पृथ्वी सूर्य की आकर्षण शक्ति से वशीभूत होकर उसकी परिक्रमा का रही हैं. सूर्य लगभग पृथ्वी से 9.38 लाख मील दूरी पर स्थित हैं. इतनी दूरी पर रहते हुए भी पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का श्रेय उसे ही दिया जाता हैं. 30 किलोमीटर/ सेकंड की गति से चलते हुए पृथ्वी लगभग 365 ¼ दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा करती है. सूर्य का आकर्षण बल पृथ्वी से 28 गुना अधिक हैं, अर्थात पृथ्वी पर यदि कसी वस्तु का भार 10 किलोग्राम हैं तो सूर्य पर उसका भार 280 किलोग्राम होगा. सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 8 मिनट लगते हैं और यदि सूर्य पर कोई जोरदार विस्फोट होगा तो पृथ्वी तक उस ध्वनि को उसे आने में 14 साल लग जायेंगे. 


पृथ्वी का आकर चपटापन लिए हैं और उसकी भ्रमण कक्षा भी अंडाकार हैं . इसी विशेषता से शीत और ग्रीष्म ऋतुएँ आती हैं.


आधुनिक विज्ञान केवल सूर्य के प्रकाश,ताप और आणविक विकरण का कुछ अंश ही पता लगा पाया हैं. लेकिन यह सब उसके स्थूल गुण हैं जो किसी भी मानव निर्मित मशीन से प्राप्त किये जा सके हैं लेकिन सूर्य के अन्दर एक सूक्ष्म सत्ता भी उपस्थित रहती हैं जो जीवनी- शक्ति बन कर प्राणियों को उत्पन्न करने, पोषण करने और अभिवर्धन करने का कार्य करती हैं.


पृथ्वी का समस्त जीवन-क्रम सूर्य से ही चलता हैं. अगर सूर्य मिट जाये तो पृथ्वी से समस्त चर-अचर जीवों का अस्तित्व मात्र 3 दिनों में ही समाप्त हो जायेगा. सूर्य से ताप, विद्युत, और प्रकाश की अनवरत निकलने वाली तरंगें यदि पृथ्वी तक नहीं पहुंचे तो सर्वत्र नीरवता, स्तब्धता , परिलक्षित होगी. अणुओं की सक्रित्यता जो पदार्थों का अविर्भाव , अभिवर्धन एवं परिवर्तन करती हैं उसका कोई अस्तित्व नहीं होगा.


सूर्य के प्रकाश की सबसे छोटी इकाई फोटोन में विद्युत, ऊष्मा , और गति तीनों तत्व होते हैं. अतः यह जीवन की सबसे छोटी इकाई प्���ाण - तत्व का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. सृष्ठी के आरंभ से पृथ्वी के वातावरण,प्राणियों,पदार्थों और ऋतुओं में जो भी परिवर्तन आये हैं वे सब सूर्य और पृथ्वी के मध्य चलने वाले विद्युत-चुम्बकीय अदान-प्रदान और प्रतिक्रियाओं से संभव हो पाएं हैं.

सूर्य की नवग्रहों में गिनती 


सूर्य सौर-मंडल में स्थित एक विशालकाय प्रकाश-पुंज तारा हैं जो निश्चित रूप से ग्रह की परिभाषा में नहीं आता हैं. ग्रह तो उसे कहते हैं जो हमारे सौर-मंडल के केंद्र में अवस्थित सूर्य की अपनी -अपनी कक्षा में रहकर परिक्रमा करतें हैं और उससे प्रकाश और ऊर्जा ग्रहण करते हैं, तथा उनमें अपना कोई ताप और तेज़ नहीं होता हैं.


लेकिन हम पृथ्वी निवासी पृथ्वी पर रह कर सूर्य सहित सभी ग्रहों से प्रभावित होतें हैं , अतः ज्योतिषशास्त्र में सूर्य के स्थान पर पृथ्वी को ही केंद्र मान कर , पृथ्वी को स्थिर मान कर , सूर्य को उसकी परिक्रमा करने वाला ग्रह मान लिया हैं.


यह ठीक उसी प्रकार हैं जैसे चलती हुई रेलगाड़ी में बैठ कर हम उसे [ रेलगाड़ी को ] स्थिर और उसके बाहर अगल-बगल के स्थिर पेड, पौधों और मकान इत्यादि को द्रृत गति से दौड़ते हुआ गतिशील देखते है. 


सूर्य- ज्योतिष -हम

सूर्य से निकलने वाली प्रकाश रश्मियों की सूक्ष्मतम इकाई - फोटोन-कई रंगों के अणुओं से बनी होती हैं. मानव शरीर की प्रकाश-आभा या औरा भी कई रंगों के अणुओं से मिलकर बनी होती हैं. 

सूर्य के प्रकाश की तरंगों का मनुष्य के औरा पर प्रतिक्षण प्रभाव पड़ता हैं . इसी प्रभाव के परिणाम स्वरुप औरा अपना रंग बदलता हैं. इन्ही प्रकाश अणुओं के प्रभाव से स्वाभाव, संस्कार, इच्छाएं,एवं क्रिया-शक्ति का निर्माण होता हैं.

प्रातः काल सूर्य की किरने तिरछी पड़ती हैं, मध्यं में सीधी पड़ती हैं एवं रात्रि में किरणों का आभाव होता हैं. इस प्रकार जिस समय बच्चे का जन्म होता हैं उस समय सूर्य से विकरित होने वाली तरंगों के अनुसार उसका स्वाभाव बनता हैं. अर्थात समय के अनुसार स्वाभाव बन जाता हैं.


ग्रीष्म ऋतू [ जब सूर्य वृष और मिथुन राशि में होता हैं] में, सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं. हेमंत ऋतू [ जब सूर्य वृश्चिक और धनु राशि में होता हैं] में तिरछी पड्ती है . अतः इन ऋतुओं में सूर्य की रश्मि में उत्पन्न बालकों का स्वाभाव, शारीरिक , मानसिक स्थिति भिन्न-भिन्न होगी.


ध्रुव प्रकाश में प्रखर तीब्रता मार्च और सितम्बर [ चैत और अश्विन की नवरात्री] में देखि जाती हैं. इस समय पृथ्वी का अक्ष सूर्य के साथ उचित कोण पर होता हैं . धरती पर बीज बोने का यही समय प्रभावी होता हैं. साधक गण अधिकतर साधनों में सफलता भी इसी समय प्राप्त करते हैं. ऐसा सूर्य से निकालने वाली विशिष्ट विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव से होता हैं.

मानव शरीर में स्थित Endocrine glands जैसे Thyriod , Peanal , Adrenal , Pituitary आदि मष्तिष्क से उत्पन्न होने वाले विचारों को प्रभावित करते हैं. ये ग्रंथियां सूर्य से अपना सम्बन्ध स्थापित कर स्वयं को विशिष्ट प्रकाश किरणों से भर लेती है . जैसा प्रकाश अवशोषित होगा उसी प्रकार की विचार तरंगें मस्तिष्क में पैदा होंगी. उदाहरण के लिए जिस मानव की ग्रंथि लाल रंग के प्रकाश के कणों को प्रचुरता में ग्रहण करेगी उस मानव का स्वभाव उग्रता, वीरता और उत्तेजना से पूर्ण होगा.

आधुनिक भौतिक विज्ञान आज कल उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचने की कोशिश कर रहा हैं , जिस पर सदियों पहले भारतीय तत्त्ववेता और ज्योतिष के मर्मज्ञ पहुँच चुके थे. आज कल भौतिकविद भी स्वीकार करने लगे हैं की सौर-मंडल की गतिविधियाँ पृथ्वी के वातावरण और जैविक एवं मानवीय परिस्थियों पर प्रभाव डालती हैं

Tuesday, September 4, 2012

Father of computer programing

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जनक (Father of computer programing)

महर्षि पाणिनि के बारे में जाने -

पाणिनि (५०० पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 460 ईसा पूर्व माना जाता है

एक शताब्दी से भी पहले प्रिसद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट ( Science of Thought) में कहा -
"मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है । .... अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक वेश्लेषण के बाद अविशष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।"
 
The M L B D News letter ( A monthly of indological bibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first softwear man without hardwear घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था " Sanskrit software for future hardware " जिसमे बताया गया " प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद, वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, परआज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।
 
व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ मे पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।
 
 NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs.ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की शृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुस्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs. द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।
 
महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।
 
पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार :-
  • "पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है" (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
  • "पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं" (कोल ब्रुक)।
  • "संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है... यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है" (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
  • "पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा"। (प्रो. मोनियर विलियम्स)
।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।


 

Tuesday, June 26, 2012

correct method of doing Namaskār

What is the correct method of doing Namaskār?
Herein the answer.

While paying obeisance to God
  1. While paying obeisance to God, bring the palms together. 
  • The fingers should be held loose (not straight & rigid) while joining the palms.
  • The fingers should be kept close to each other without leaving any space between them.
  • The fingers should be kept away from the thumbs.
  • The inner portion of the palms should not touch each other and there should be some space between them.
IMPORTANT : The stage of awakening of spiritual emotion (bhāv) is important to the seeker at the primary level. Hence, for awakening spiritual emotion ( bhāv), he should keep space in between the palms, whereas a seeker who is at the advanced level should refrain from leaving such space in between the palms to awaken the unexpressed spiritual emotion ( bhāv).
  1. After joining the hands one should bow and bring the head forward.
  2. While tilting the head forward, one should place the thumbs at the mid-brow region, i.e. at the point between the eyebrows and try to concentrate on the feet of the Deity.
  3. After that, instead of bringing the folded hands down immediately, they should be placed on the mid-chest region for a minute in such a way that the wrists touch the chest; then only should the hands be brought down.
In the Namaskār posture
  1. The fingers should not be stiff while bringing the palms together because this will lead to a decrease in Sattva component from the vital and mental sheaths and thus increase the Raja component in them. By keeping the fingers relaxed, the subtlest Sattva component will get activated. With the strength of this energy, embodied souls are able to fight powerful distressing energies.
  2. In the Namaskār posture, the joined fingers act as an antenna to assimilate the Chaitanya (Divine consciousness) or the Energy transmitted by a Deity. While joining the palms, the fingers must touch each other because leaving space between the fingers will result in accumulation of energy in that space. This energy will be immediately transmitted in various directions; therefore the seeker's body will lose the benefit of this potent energy.
  3. About the space to be maintained between the palms : For a seeker at the primary level, it is advisable to leave space between the palms; it is not necessary for a seeker at an advanced level to leave space between the palms.
  4. After joining the palms, bow a little. This posture puts pressure on the navel and activates the five vital energies situated there. Activation of these vital energies in the body makes it sensitive to accepting sāttvik frequencies. This later awakens the ' ātmashakti ' (i.e. energy of the soul) and later, bhāv is awakened. This enables the body to accept in large measures the Chaitanya emitted by the Deity.
  5. Touch the thumbs to the mid-brow region. (Please see images above.) This posture awakens the bhāv of surrender in an embodied soul, and in turn activates the appropriate subtle frequencies of Deities from the Universe. They enter through the ' Ādnyā-chakra ’ (sixth centre in the spiritual energy system located in the mid-brow region in the subtle body) of the embodied soul and settle in the space parallel to it at the back interior of the head. In this space the openings to all the three channels converge; namely, the Moon, the Central and the Sun channels. Due to the movement of these subtler frequencies in this space, the Central Channel is activated. Consequently it facilitates the speedy transmission of these frequencies throughout the body, leading to purification of both the gross and subtle bodies at the same time.
  6.  After doing Namaskār , to completely imbibe the Chaitanya of the Deity (that has entered the hands by now), instead of bringing the folded hands down immediately, place them on the mid-chest region in such a way that the wrists touch the chest. The ‘ Anāhat-chakra ‘ is located at the centre of the chest. Akin to the Ādnyā-chakra ’, the activity of the ‘ Anāhat-chakra ‘ is also to absorb the Sattva frequencies. By touching the wrists to the chest, the ‘ Anāhat-chakra ‘ is activated and it helps in absorbing more of the Sattva component. Effect of this Posture : By doing Namaskār in this manner, the Deity's Chaitanya is absorbed to a greater extent by the body, as compared to other methods of doing Namaskār . This gives maximum distress to negative energies. The negative energies that have manifested in a person are unable to touch their thumbs at the mid-brow region in Namaskār . (The negative energies are subtle. But at times they enter an individual's body and manifest in it.)
Question : What is the reason for not wrapping a cloth around the neck while performing circumambulation, doing Namaskār , ritualistic worship, sacrificial fires, chanting and while visiting Guru and Deities?

Answer : When a cloth is wrapped around the neck, it does not activate the Vishuddha-chakra (fifth centre in the spiritual energy system located in the neck in the subtle body) and hence an individual gets less benefit of the Sattva component.

Tuesday, May 15, 2012

About Nalanda University

नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई...

ABOUT Nalanda University

Nalandawas an ancient center of higher learning in Bihar, India. The site of Nalanda is located in the Indian state of Bihar, about 88 kilometers south east of Patna, and was a Buddhist center of learning from the fifth or sixth century CE to 1197 CE. It has been called "one of the first great universities in recorded history". ( This para taken from wikipedia )

एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क मियां लूटेरा था ....बख्तियार खिलजी. इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया। !!
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था. एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली, मगर वह ठीक नहीं हो सका. किसी ने उसको सलाह दी... नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय !!
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय वैद्य ...उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा !!
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी... मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा, किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो. बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत उपाय सोचा... अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए.. कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया .. जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई.. उसको बहुत गुस्सा आया कि उसके मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर, उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके जलती रहीं उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन बनाये पड़ी हैं... ! उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को !!
यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह कैसे ठीक हुआ था.?
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते, थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के पलटते हैं...! बस... वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था... वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया!!
आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान लेते है !!
यह प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
स्वरूप
यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
 
परिसर
अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।
प्रबंधन
समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य
इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम
प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और उसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति
इस विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी। शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर में अध्ययन तथा शंका समाधान चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र
यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय 
नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर' नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था। 'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से अनेक पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने साथ ले गये थे।

Monday, March 19, 2012

Sachin Tendulkar

Sachin Tendulkar completes 100 Hundreds

Master Blaster Sachin Tendulkar completed his 100th Hundred in league match of Asia Cup against Bangladesh at Shere Bangla National Stadium, Mirpur Bangladesh on 16th March 2012. Overall Sachin scored 49 hundreds in ODI and 51 in Test matches. Here is a stastical look at his hundreds...

 Sachin - After completed 100th century