Wednesday, September 30, 2015

Never go for Abortion गर्भपात करवाना गलत है

गर्भपात करवाना गलत है या सही आप खुद तय करें

इस post को पूरा पढ़ें, मुझे विश्वास है इसको पढ़ने के बाद शायद ही कोई इंसानी प्रवृत्ति का इंसान गर्भपात कराने या करवाने को सोचेगा।


गर्भस्थ बच्ची की हत्या का आँखोँ देखा विवरण अमेरिका में सन 1984 में एक सम्मेलन हुआ था नेशनल राइट्स टू लाईफ कन्वैन्शन।
इस सम्मेलन के एक प्रतिनिधि ने डॉ॰ बर्नार्ड नेथेनसन के द्वारा गर्भपात की बनायी गयी एक अल्ट्रासाउण्ड फिल्म 'साइलेण्ट स्क्रीम' (गूँगी चीख) का जो विवरण दिया था, वह इस प्रकार है |
गर्भ की वह मासूम बच्ची अभी दस सप्ताह की थी व काफी चुस्त थी। हम उसे अपनी माँ की कोख मेँ खेलते, करवट बदलते व अंगूठा चूसते हुए देख रहे थे। उसके दिल की धड़कनों को भी हम देख पा रहे थे और वह उस समय 120 की साधारण गति से धड़क रहा था। सब कुछ बिलकुल सामान्य था; किन्तु जैसे ही पहले औजार (सक्सन पम्प) ने गर्भाशय की दीवार को छुआ, वह मासूम बच्ची डर से एकदम घूमकर सिकुड़ गयी और उसके दिल की धड़कन काफी बढ़ गयी।


हालांकि अभी तक किसी औजार ने बच्ची को छुआ तक भी नहीं था, लेकिन उसे अनुभव हो गया था कि कोई चीज उसके आरामगाह, उसके सुरक्षित क्षेत्र पर हमला करने का प्रयत्न कर रही है। हम दहशत से भरे यह देख रहे थे कि किस तरह वह औजार उस नन्हीं- मुन्नी मासूम गुड़िया- सी बच्ची के टुकड़े-टुकड़े कर रहा था। पहले कमर, फिर पैर आदि के टुकड़े ऐसे काटे जा रहे थे जैसे वह जीवित प्राणी न होकर कोई गाजर-मूली हो और वह
बच्ची दर्द से छटपटाती हुई, सिकुड़कर घूम-घूमकर तड़पती हुई इस हत्यारे औजार से बचने का प्रयत्न कर रही थी। वह इस बुरी तरह डर गयी थी कि एक समय उसके दिल की धड़कन 200 तक पहुँच गयी! मैँने स्वंय अपनी आँखों से उसको अपना सिर पीछे झटकते व मुँह खोलकर चीखने का प्रयत्न करते हुए देखा, जिसे डॉ॰ नेथेनसन ने उचित ही 'गूँगी चीख' या 'मूक पुकार' कहा है। अंत मेँ हमने वह नृशंस वीभत्स दृश्य भी देखा, जब सँडसी उसकी खोपड़ी को तोड़ने के लिए तलाश रही थी और फिर दबाकर उस कठोर खोपड़ी को तोड़ रही थी क्योँकि सिर का वह भाग बगैर तोड़े सक्शन ट्यूब के माध्यम से बाहर नहीं निकाला जा सकता था।' हत्या के इस वीभत्स खेल को सम्पन्न करने में करीब पन्द्रह मिनट का समय लगा और इसके दर्दनाक दृश्य का अनुमान इससे अधिक और कैसे लगाया जा सकता है कि जिस डॉक्टर ने यह गर्भपात किया था और जिसने मात्र कौतूहलवश इसकी फिल्म बनवा ली थी,उसने जब स्वयं इस फिल्म को देखा तो वह अपना क्लीनिक छोड़कर चला गया और फिर वापस नहीं आया !

मित्रों रोमांस करें, मस्ती करें लेकिन ऐसी स्थिति ही न आने दें की गर्भपात कराने जैसा घिनौना अपराध और पाप करने की नौबत आये । सोचो अगर हमारे माता -पिता ऐसा किये होते तो हमारा वज़ूद ऐसे ही घिनौने तरीके से महज 15 -20 मिनट में खत्म हो गया होता। 

रोमांस करें, मस्ती करें लेकिन ऐसी स्थिति ही न आने दें की गर्भपात कराने जैसा घिनौना अपराध और पाप करने की नौबत आये।
और जो लोग लड़की है इसलिए गर्भपात करते या करवाते हैं उनको और उनकी मानसिकता को क्या कहूँ, बस ये समझ लो की इतना घिनौना शब्द आजतक नहीं बना जो उनको बोला जाए।

मित्रों सोचो अगर हमारे माता -पिता ऐसा किये होते तो हमारा वज़ूद ऐसे ही घिनौने तरीके से महज 15 -20 मिनट में खत्म हो गया होता।

मित्रो ये पोस्ट कॉपी किया है लेकिन दिल को छु जाने वाली है। 
आपका एक शेयर किसी अजन्मी बच्ची - लडकी की जान बचा सकता है!

Saturday, February 21, 2015

Wednesday, February 19, 2014

Why is the layout of a keyboard is Q-W-E-R-T-Y not simply A-B-C-D-E-F?

Why was computer keyboards designed in the current format not in a alphabetical order?


 
It hasn’t been done randomly or just for fun, it has a very distinct and purposeful reason behind it.

The current format of the keyboard was devised long back in 1870’s by a gentleman named Christopher Latham Sholes (an American inventor who invented the first practical typewriter and the QWERTY keyboard). Though, it definitely was not the first format to come up, it didn’t take much time to switch to this one. Starting with lexicographic order i.e. A-B-C-D-E-F, after various trials and errors and taking hundreds of cases, Christopher Sholes gradually reached the Q-W-E-R-T-Y. It was really well received (evident from the fact that we still use it).

When the typewriter was invented, it used a metal bar to hold the character alphabets and the other end of the bar was attached to a linkage carrying a carriage with the coated ink. When a key was struck, it would emboss its character on the paper placed beneath the carriage. However, when an operator learned to type at a great speed, a certain flaw invoked. When two letters were struck in quick succession, the bars of the typewriter would entangle and get jammed.

Christopher Sholes found a way out. He proposed that the letters of frequently used letter pairs should be in different rows. For example, ‘C-H’, ‘S-T’, ’T-H’, ‘W-H’ and more. He also formulated that to speed up the typing process, there has to be a regular alternation between two hands. So observing thousands of words, he placed the letters in way that most words would make use of both hands.

He also observed that almost every word in the dictionary carries a vowel. According to him, the most frequently used vowel was ‘A’ and the most frequently used letter (non-vowel) was ‘S’. So he placed ‘A’ and ‘S’ together and chose to keep less common letters like ‘Q’, ‘W’, ‘Z’, ‘X’, ‘C’ around these. This was complemented by placing fairly common letters like ‘M’, ‘N’, ‘L’, ‘K’, ‘O’, ‘P’ at right extremes to create a perfect alternation between both the hands.

All these factors tested with thousands of trials gave us the format that we still use and perhaps would be using till eternity.

Tuesday, January 14, 2014

Reality of Qutab Minar कुतुबमीनार की सच्चाई

कुतुबमीनार की सच्चाई !!

1191 में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया, तराइन के मैदान में पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध में गौरी बुरी तरह पराजित हुआ,

1192 में गौरी ने दुबारा आक्रमण में पृथ्वीराज को हरा दिया, क़ुतुबबुद्दीन, गौरी का सेनापति था.

1206 में गौरी ने कुतुबुद्दीन को अपना नायब नियुक्त किया और जब 1206 में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हुई वह गद्दी पर बैठा. अनेक विरोधियों को समाप्त करने में उसे लाहौर में ही दो वर्ष लग गए I

1210 लाहौर में पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर उसकी मौत हो गयी. अब इतिहास के पन्नों में लिख दिया गया है कि कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार, कुवैतुल इस्लाम मस्जिद और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद भी बनवाई I

अब कुछ प्रश्न .......

  • कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई, लेकिन कब ?
  • क्या कुतुबुद्दीन ने अपने राज्य काल 1206 से 1210 मीनार का निर्माण करा सकता था ? जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये और 1210 में भी मरने के पहले भी वह लाहौर में था !!

शायद नहीं I

कुछ ने लिखा कि इसे 1193 में बनाना शुरू किया. यह भी कि कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं. उसके ऊपर तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और उसके ऊपर कि शेष मंजिलें बाद में बनी I यदि

1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरू किया होता तो उसका नाम बादशाह गौरी के नाम पर "गौरी मीनार " या ऐसा ही कुछ होता न कि सेनापति कुतुबुद्दीन के नाम पर क़ुतुब मीनार I

उसने लिखवाया कि उस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई, अब क्या किसी भवन के मलबे से कोई क़ुतुब मीनार जैसा उत्कृष्ट कलापूर्ण भवन बनाया जा सकता है जिसका हर पत्थर स्थानानुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है ?

कुछ लोगो ने लिखा कि नमाज़ समय अजान देने के लिए यह मीनार बनी पर क्या उतनी ऊंचाई से किसी कि आवाज़ निचे तक आ भी सकती है ?



उपरोक्त सभी बातें झूठ का पुलिंदा लगती है इनमें कुछ भी तर्क की कसौटी पर सच्चा नहीं सच तो यह है की जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है वह मेहरौली कहा जाता है,

मेहरौली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक , और खगोलशास्त्री थे उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए २७ कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था I

इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्म कारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहींदिख जाती हैं I

कुछ संस्कृत भाषा के अंश दीवारों और बीथिकाओं के स्तंभों पर उकेरे हुए मिल जायेंगे जो मिटाए गए होने के बावजूद पढ़े जा सकते हैं I मीनार , चारों ओर के निर्माण का ही भाग लगता है, अलग से बनवाया हुआ नहीं लगता, इसमे मूल रूप में सात मंजिलें थीं सातवीं मंजिल पर " ब्रम्हा जी की हाथ में वेद लिए हुए " मूर्ति थी जो तोड़ डाली गयीं थी ,

छठी मंजिल पर विष्णु जी की मूर्ति के साथ कुछ निर्माण थे वे भी हटा दिए गए होंगे,

अब केवल पाँच मंजिलें ही शेष है इसका नाम विष्णु ध्वज /विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ प्रचलन में थे.

इन सब का सबसे बड़ा प्रमाण उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख जिसे झुठलाया नहीं जा सकता, लिखा है की यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है,

सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं) द्वारा स्थापित किया गया था और यह लौह स्तम्भ आज भी विज्ञानं के लिए आश्चर्य की बात है कि आज तक इसमें जंग नहीं लगा. उसी महानसम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट, खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण विशेषज्ञ वराह मिहिर, वैद्य राज ब्रम्हगुप्त आदि हुए.

ऐसे राजा के राज्य काल को जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ तो क्या जंगल में अकेला स्तम्भ बना होगा निश्चय ही आसपास अन्य निर्माण हुए होंगे जिसमे एक भगवन विष्णु का मंदिर था उसी मंदिर के पार्श्व में विशालस्तम्भ वि ष्णुध्वज जिसमे सत्ताईस झरोखे जो सत्ताईस नक्षत्रो व खगोलीय अध्ययन के लिए बनाए गए निश्चय ही वराह मिहिर के निर्देशन में बनाये गए. इस प्रकार कुतब मीनार के निर्माण का श्रेय सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य के राज्य कल में खगोल शाष्त्री वराहमिहिर को जाता है I

कुतुबुद्दीन ने सिर्फ इतना किया कि भगवान विष्णु के मंदिर को विध्वंस किया उसे कुवातुल इस्लाम मस्जिद कह दिया, विष्णु ध्वज (स्तम्भ ) के हिन्दू संकेतों को छुपाकर उन पर अरबी के शब्द लिखा दिए और बन गया क़ुतुब मीनार !!

Sunday, January 12, 2014

ABOUT SWAMI VIVEKANAND JI

जन्म दिन पर विशेष

स्वामी विवेकानन्द


संवादस्वामी विवेकानन्दस्वामी विवेकानन्द शिकागो (1893) मेंचित्र में स्वामी विवेकानन्द ने बाँग्ला एवं अँग्रेज़ी भाषा में लिखा है: "एक असीमित, पवित्र, शुद्ध सोच एवं गुणों से परिपूर्ण उस परमात्मा को मैं नतमस्तक हूँ।" इसी चित्र में दूसरी ओर स्वामी विवेकानन्द के हस्ताक्षर हैं।गुरु/शिक्षकरामकृष्ण परमहंसदर्शनवेदान्त व अध्यात्म आधारित हिन्दू दर्शनकथन"उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये"[1]स्वामी विवेकानन्द (जन्म: १२ जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंनेरामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ करने के लिये जाना जाता है।[2] उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

जीवनवृत्त




गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट कोलकाता स्थित स्वामी विवेकानन्द का मूल जन्मस्थान जिसका पुनरुद्धार करके अब सांस्कृतिक केन्द्र का रूप दे दिया गया हैस्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी सन् १८६३ (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् १९२०)[3] को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजीपढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। परन्तु उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से ही बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गये परन्तु वहाँ उनके चित्त को सन्तोष नहीं हुआ। वे वेदान्त और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिये महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे।दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दरिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। वे स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंसको समर्पित कर चुके थे। उनके गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरु की सेवा में सतत संलग्न रहे।विवेकानन्द बड़े स्‍वप्न‍दृष्‍टा थे। उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे। उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएँ थीं। आज के युवकों के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है। उनके नाना जी का नाम श्री नंदलाल बसु था ।

बचपन 



माँ भुवनेश्वरी देवी (1841-1911) का एक चित्रबचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारतआदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कारगहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।

निष्ठा


एक बार किसी शिष्य ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को क्रोध आ गया। वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। और आगे चलकर समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक फैला सके। ऐसी थी उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा।

सम्मलेन भाषण


मेरे अमरीकी भाइयो और बहनों!आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

यात्राएँ


स्वामी विवेकानन्द शिकागो के विश्व धर्म परिषद् में बैठे हुए२५ वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिbb थे। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ १८९३ में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। योरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया। [4] "अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा" यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया। जब भी वे कहीं जाते थे तो लोग उनसे मिलकर बहुत खुश होते थे!

विवेकानन्द का योगदान तथा महत्व


 


मुम्बई में गेटवे ऑफ़ इन्डिया के निकट स्थित स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमूर्तिउन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।"रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-"उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।"वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था-"नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।" और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गान्धीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं-केवल यहीं-आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन-"‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।"उन्नीसवी सदी के अन्तिम वर्षों में लिया गया क्रान्तिकारी वेशधारी विवेकानन्द का एक दुर्लभ चित्र। यह चित्र देखकर उन्होंने कहा था-"यह चित्र तो डाकुओं के किसी सरदार जैसा लगता है।"[5]उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी देश को आजाद करना चाहते थे। परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही विवेकानन्द ने ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला।उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें। उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा, लिजलिजा और वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये।उनका यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी। आज कोई दूसरा साधु तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मन्दिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती। विवेकानन्द के जीवन की अन्तर्लय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है।उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ायी और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। स्वामीजी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है।यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था। यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में उसी पर मुहर लगायी।

मृत्यु


वेलूर मठ स्थित स्वामी विवेकानन्द मन्दिरविवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन ४ जुलाई १९०२ को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था।[6]उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरु रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये १३० से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।


महत्त्वपूर्ण तिथियाँ 

 


12 जनवरी, 1863 -- कलकत्ता में जन्म1879 -- प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश1880 -- जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेशनवंबर 1881 -- रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट1882-86 -- रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध1884 -- स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास1885 -- रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी16 अगस्त, 1886 -- रामकृष्ण परमहंस का निधन1886 -- वराहनगर मठ की स्थापनाजनवरी 1887 -- वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा1890-93 -- परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण25 दिसंबर, 1892 -- कन्याकुमारी में13 फरवरी, 1893 -- प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में31 मई, 1893 -- बम्बई से अमरीका रवाना25 जुलाई, 1893 -- वैंकूवर, कनाडा पहुँचे30 जुलाई, 1893 -- शिकागो आगमनअगस्त 1893 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो० जॉन राइट से भेंट11 सितम्बर, 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान27 सितम्बर, 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान16 मई, 1894 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषणनवंबर 1894 -- न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापनाजनवरी 1895 -- न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भअगस्त 1895 -- पेरिस मेंअक्तूबर 1895 -- लन्दन में व्याख्यान6 दिसंबर, 1895 -- वापस न्यूयॉर्क22-25 मार्च, 1896 -- फिर लन्दनमई-जुलाई 1896 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान15 अप्रैल, 1896 -- वापस लन्दनमई-जुलाई 1896 -- लंदन में धार्मिक कक्षाएँ28 मई, 1896 -- ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट30 दिसम्बर, 1896 -- नेपल्स से भारत की ओर रवाना15 जनवरी, 1897 -- कोलम्बो, श्रीलंका आगमन6-15 फरवरी, 1897 -- मद्रास में19 फरवरी, 1897 -- कलकत्ता आगमन1 मई, 1897 -- रामकृष्ण मिशन की स्थापनामई-दिसम्बर 1897 -- उत्तर भारत की यात्राजनवरी 1898 -- कलकत्ता वापसी19 मार्च, 1899 -- मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना20 जून, 1899 -- पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा31 जुलाई, 1899 -- न्यूयॉर्क आगमन22 फरवरी, 1900 -- सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापनाजून 1900 -- न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा26 जुलाई, 1900 -- योरोप रवाना24 अक्तूबर, 1900 -- विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा26 नवम्बर, 1900 -- भारत रवाना9 दिसम्बर, 1900 -- बेलूर मठ आगमन10 जनवरी 1901 -- मायावती की यात्रामार्च-मई 1901 -- पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्राजनवरी-फरवरी 1902 -- बोध गया और वाराणसी की यात्रामार्च 1902 -- बेलूर मठ में वापसी4 जुलाई, 1902 -- महासमाधि

Friday, August 16, 2013

एक विचित्र आजादी

  • जहा जीत के सबसे बड़े ''योद्धा'' का गुमनाम बना दिया गया
  • सम्पूर्ण स्वर्णिम इतिहास ''वामपंथियो'' की मदद से पलटा गया, आर्थिक मदद अंग्रेजो के लूटे हुए धन से ली गयी.
  • जिन्ना को जबरदस्ती ''पाकिस्तान'' दिया गया , जबकि 5-6 % मुस्लिम समुदाय इस बटवारे के पक्षधर थे ! 
  • उन अंग्रेजो की ''अंग्रेज़ी'' थाम ली जिसने हमको 200 साल लुटा , जिन अंग्रेजो ने नालन्दा जलाया , हमारे ज्ञान भंडार को अपने नाम से प्रकाशित किया ,
  • अंग्रेजो की कूटनीति के तहत, मुस्लिम हिन्दू विरोधी दंगे मात्र सत्ता के लिये जबरदस्ती करवाये गये , आज जनता दुसमन अंग्रेज़ को नही पाकिस्तान को मानते है ,,
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अब इस गुलामी दिवस की पूर्व संध्या के रूप में मनाऊ ,या 35 लाख हिन्दू सिक्खों के बलिदान दिवस के रूप में मनाऊ ?
1947 में , मुस्लिम समाज के भी निर्दोष लोग मारे गये , आजादी के नाम पर शुरु हुए दंगे आज तक जारी है , कभी असम कभी किस्तवाडा ,न्याय , समाधन किसी को नही मिला , ना ही आगे भी दिख रहा है , डर है , हिन्दू मुस्लिम के नाम पर मिली इस आजादी में, जल्दी ही कही कही पूरा देश ही ना जल जाये ! उधर , व्यापारी चीन भी नये सौदे , संभावना की तलाश में सीमा पर खड़ा है , बस इन यहूदियो , अंग्रेजो और रोम के जाल (इल्लुमिनाती) पर जनता की नजर ही नही है !!

महात्मा गांधी की हत्या के अभियुक्तों का एक समूह चित्र।

खड़े हुए : - शंकर किस्तैया, गोपाल गौड़से, मदनलाल पाहवा, दिगंबर बड़गे.
बैठे हुए: -  नारायण आप्टे, वीर सावरकर, नाथूराम गौड़से, विष्णु विष्णु करकरे
नाथूराम गोडसे पर मोहनदास करमचन्द गान्धी की हत्या के लिये अभियोग पंजाब उच्च न्यायालय में चलाया गया था। इसके अतिरिक्त उन पर १७ अन्य अभियोग भी चलाये गये। किन्तु इतिहासकारों के मतानुसार सत्ता में बैठे लोग भी गान्धी जी की हत्या के लिये उतने ही जिम्मेवार थे जितने कि नाथूराम गोडसे या उनके अन्य साथी। इस दृष्टि से यदि विचार किया जाये तो मदनलाल पाहवा को इस बात के लिये पुरस्कृत किया जाना चाहिये था ना कि दण्डित क्योंकि उसने तो हत्या-काण्ड से दस दिन पूर्व उसी स्थान पर बम फोडकर सरकार को सचेत किया था

Monday, May 20, 2013

Indian-American teen invents 20-second charger



An 18-year-old Indian-American girl has invented a super-capacitor device that could potentially charge your cellphone in less than 20 seconds.

Eesha Khare, from Saratoga, California, was awarded the Young Scientist Award by the Intel Foundation after developing the tiny device that fits inside mobile phone batteries, that could allow them to charge within 20-30 seconds.

According to Khare, her device can last for 10,000 charge-recharge cycles, compared with 1,000 cycles for conventional rechargeable batteries.The so-called super-capacitor, a gizmo that can pack a lot of energy into a tiny space, charges quickly and holds its charge for a long time